चंडीगढ़: भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा व भैया बलराम तीनों अपनी मौसी के यहां से वापस मंदिर गर्भगृह में लोटे। गुंडीचा मंदिर मौसी के घर आराम करने के बाद भगवान जगन्नाथ, स्वामी बलभद्र और भगवती सुभद्रा आज रथारूढ़ होकर जगन्नाथ धाम लोटे। इस यात्रा को बाहुड़ा यात्रा (Bahuda Yatra) कहा जाता है भगतों ने रथ यात्रा अनुष्ठान में भाग लिया पुष्प की बारिश कर भगतों ने सर्व मंगल की कामना की।
बता दें कि बहुदा यात्रा 12वीं शताब्दी के जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह में भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ की वापसी का प्रतीक है, जिसे नीलाद्री बीज कहा जाता है। इस दौरान घंटा, झाल, शंख और 'हरि बोल' के उच्चारण के बीच देवताओं को गुंडिचा मंदिर से बाहर लाया गया और उन्हें 'पहंडी' जुलूस के जरिए रथ पर ले जाया गया। भगवान जगन्नाथ जी की ये रथ यात्रा हिंदू सनातन धर्म के सबसे बड़े, भव्य और प्राचीन धार्मिक उत्सवों में से एक मानी जाती है।
“मौसी गुंडिचा के घर से आज श्रीमंदिर वापस लौटे महाप्रभु, रूठी हुई पत्नी को मनाया*
उत्कल सांस्कृतिक संघ सेक्टर 31 सिथत श्री जगन्नाथ मंदिर के सचिव अनिल मालिक के अनुसार हेरा पंचमी की एक परंपरा में भगवान को ढूंढ़ते हुए देवी लक्ष्मी गुंडिचा मंदिर जाती हैं। यहां किसी बात से गुस्सा होकर भगवान के रथ का एक पहिया तोड़कर श्रीमंदिर चली आती हैं। द्वादशी पर श्रीमंदिर में लक्ष्मी जी के निर्देश से द्वैतापति दरवाजा बंद कर देते हैं, भगवान जगन्नाथ अपने भाई और बहन के साथ वापस अपने मंदिर आते हैं। जब वह वापस आते हैं, तो मां लक्ष्मी भी दरवाजा नहीं खोलती हैं। भगवान जगन्नाथ का रास्ता मां लक्ष्मी की दासियां रोकती हैं और दूसरी ओर बाबा के कुछ सेवक उन्हें हटाने का प्रयास करते हैं इस संस्कार को ‘निलाद्री बिजे’ कहा जाता और अंत में मां लक्ष्मी मान जाती हैं। इसके लिए उन्हें एक खास तोहफा मां लक्ष्मी को देना होता है और ये तोहफा सफेद रसगुल्ले होते हैं।
*भक्तों को दर्शन देने के बाद मौसी के घर रुके थे प्रभु*
पारंपरिक कथानुसार भगवान औषधीयुक्त काढ़ा पीकर स्वस्थ होते और भक्तों को दर्शन देने मंदिर से निकलते हैं। इसके बाद देर रात अपनी मौसी के यहां पहुंचते है। यहां भगवान करीब 8 दिनों तक मौसी के घर रहने के बाद वापस जगन्नाथ धाम लौटते हैं।
वापसी के उपरांत स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत 'सुना बेषा' और 'अधर पाना' जैसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान संपन्न होते हैं।
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