चंडीगढ़/पंचकूला: पंचकूला के इंद्रधनुष ऑडिटोरियम में आचार्य प्रशांत का विशेष सत्र आयोजित किया गया, जिसमें पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश समेत कई अन्य राज्यों से लोग शामिल हुए। कई वर्षों बाद चंडीगढ़ क्षेत्र में आयोजित इस सत्र को लेकर लोगों में खास उत्साह देखने को मिला। आयोजकों के अनुसार, कार्यक्रम में 1000 से अधिक लोगों ने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया, जबकि 1 लाख से ज्यादा दर्शकों ने इसे ऑनलाइन भी देखा।
सत्र की शुरुआत सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ हुई। इस दौरान एक विशेष नृत्य प्रस्तुति और सूफी भजनों ने माहौल को भावपूर्ण बना दिया। सभागार में मौजूद लोगों ने प्रस्तुतियों की सराहना की। कार्यक्रम के दौरान आचार्य प्रशांत का स्वागत भी किया गया और प्रतिभागियों ने उन्हें स्मृति-चिन्ह भेंट किए।
अपने संबोधन के दौरान आचार्य प्रशांत ने कठोपनिषद के गूढ़ श्लोकों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने जीवन, मृत्यु, भय, मन की अशांति, आत्मबोध और सत्य की खोज जैसे विषयों को आधुनिक जीवन से जोड़ते हुए सरल भाषा में समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य के अधिकांश संकट बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक उलझनों से पैदा होते हैं और आत्मचिंतन के माध्यम से ही उनका समाधान संभव है।
सत्र के दौरान कई बार सभागार तालियों से गूंज उठा। आचार्य प्रशांत ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि आधुनिक जीवन की दौड़ में इंसान स्वयं से दूर होता जा रहा है और उपनिषदों की शिक्षा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी। उन्होंने आध्यात्मिकता को जीवन से भागने का नहीं बल्कि जीवन को सही ढंग से समझने का माध्यम बताया।
कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण प्रश्न-उत्तर सत्र रहा। इस दौरान लोगों ने अपने निजी जीवन, रिश्तों, करियर, सामाजिक दबाव और मानसिक तनाव से जुड़े सवाल पूछे। आचार्य प्रशांत ने हर प्रश्न का स्पष्टता और संवेदनशीलता के साथ उत्तर दिया। कई लोगों ने सत्र के बाद अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि चर्चा ने उन्हें नई दृष्टि दी।
गौरतलब है कि इससे पहले आचार्य प्रशांत के लुधियाना और शिमला में भी सत्र आयोजित हो चुके हैं। उनके कार्यक्रमों में युवाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। 30 मई को वह यूके के प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में विशेष व्याख्यान देने वाले हैं। भारतीय दर्शन और आत्मज्ञान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिल रही पहचान को उनकी बढ़ती लोकप्रियता से जोड़कर देखा जा रहा है।p
No comments:
Post a Comment